धान में खैरा रोग: फसलों में जिंक की कमी के लक्षण और उपचार

· लेखक: AgriVruddhi

Zinc deficiency in maize: young plants with pale white-yellow bands on the leaves, healthy green maize behind

ऊपर की फोटो: आगे जिंक की कमी वाली मक्का, जिसकी नई पत्तियों पर हल्की पीली-सफेद पट्टियां हैं; पीछे स्वस्थ पौधे, फोटो: Alandmanson, CC BY-SA 4.0

संक्षेप में जवाब

धान का खैरा रोग किसी कीटाणु से नहीं होता। यह जिंक की कमी है। रोपाई के दो से चार हफ्ते बाद नई पत्तियां आधार (नीचे के हिस्से) पर पीली पड़ने लगती हैं, पुरानी पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे आते हैं, और खेत में जगह-जगह पौधे छोटे रह जाते हैं। मिट्टी की जांच के आधार पर इसे ठीक करें: बुवाई या रोपाई से पहले मिट्टी में जिंक डालें, या पत्तियों पर जिंक का छिड़काव करें।

धान में खैरा रोग के लक्षण और दूसरी फसलों में जिंक की कमी

पौधों में जिंक की कमी केवल धान की समस्या नहीं है। यह मक्का, कपास और मूंगफली पर भी असर करती है। जिंक पौधे को बढ़वार के हार्मोन बनाने और अपना भोजन इस्तेमाल करने में मदद करता है। जिंक कम हो तो नई बढ़वार छोटी और पीली रहती है, और पौधा ठीक से नहीं बढ़ता। लक्षण जल्दी दिखते हैं, अक्सर फसल के पहले महीने में, और आमतौर पर खेत के उन हिस्सों में जहां मिट्टी सबसे खराब है।

धान में जिंक की कमी (खैरा रोग)

  • लक्षण रोपाई के 2–4 हफ्ते बाद शुरू होते हैं, और कभी-कभी नर्सरी में ही।
  • नई पत्तियों की बीच वाली नस (मध्य शिरा) का निचला हिस्सा हल्का पीला या सफेद हो जाता है।
  • पुरानी पत्तियों पर छोटे, जंग जैसे भूरे धब्बे आते हैं। धब्बे बढ़कर आपस में मिल जाते हैं, और पत्ती भूरी होकर सिरे से सूखने लगती है।
  • पौधे बौने रह जाते हैं, कम कल्ले (टिलर) निकलते हैं, और पत्तियां छोटी व पतली होती हैं।
  • फसल जगह-जगह असमान बढ़ती है और देर से पकती है।

मक्का

  • नई पत्तियों की बीच वाली नस के दोनों ओर चौड़ी सफेद या हल्की पीली पट्टियां आती हैं, जो पत्ती के निचले हिस्से से शुरू होती हैं। इसे अक्सर "सफेद कली" (white bud) कहते हैं।
  • गांठों के बीच की दूरी कम रह जाती है, इसलिए पौधे ठिगने और बौने दिखते हैं।

कपास

  • नई पत्तियां छोटी, मोटी और नसों के बीच पीली होती हैं, जबकि नसें हरी रहती हैं।
  • पत्तियां ऊपर की ओर कटोरी जैसी मुड़ सकती हैं, और गांठों के बीच की दूरी कम होने से पौधे का ऊपरी हिस्सा गुच्छे जैसा दिखता है।

मूंगफली

  • नई पत्तियां छोटी और नसों के बीच हल्की पीली होती हैं।
  • पौधे बौने रहते हैं और फलियां कम लगती हैं।

मिलते-जुलते लक्षण और उन्हें कैसे पहचानें

  • नाइट्रोजन की कमी: पहले पुरानी पत्तियां एक समान हल्की पीली होती हैं, और पूरी फसल हल्की हरी दिखती है। जिंक की कमी पहले नई पत्तियों पर, धब्बों या पट्टियों के साथ दिखती है। हमारी गाइड देखें: पौधों में नाइट्रोजन की कमी के लक्षण।
  • आयरन (लोहे) की कमी: सबसे नई पत्तियां पूरी तरह पीली-सफेद हो जाती हैं, ज़्यादा कमी में नसें भी। यह ज़्यादा pH वाली मिट्टी में सूखी बुवाई वाले या ऊंची ज़मीन के धान में आम है।
  • सल्फर (गंधक) की कमी: नई पत्तियां एक समान हल्की पीली हो जाती हैं, जंग जैसे धब्बे नहीं होते।
  • धान का भूरा धब्बा रोग (brown spot): अंडाकार भूरे धब्बे, जिनका बीच का हिस्सा स्लेटी होता है, अक्सर चारों ओर पीला घेरा होता है, और ये पत्तियों पर बिखरे रहते हैं। खैरा के धब्बे बहुत छोटे और जंग जैसे होते हैं, और इनके साथ नई पत्तियां पीली होती हैं और खेत में जगह-जगह पौधे बौने रहते हैं।

लक्षण आपस में मिल सकते हैं और भ्रम पैदा कर सकते हैं। मिट्टी की जांच, और जहां सुविधा हो वहां पत्ती की जांच, ही पक्का पता करने का तरीका है।

खैरा रोग और जिंक की कमी क्यों होती है: मिट्टी से जुड़े कारण

ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के मिट्टी सर्वे के अनुसार, भारत की मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की सबसे आम कमी जिंक की है। अक्सर मिट्टी में जिंक होता है, पर पौधा उसे ले नहीं पाता। खतरा ज़्यादा होता है जब:

  • मिट्टी क्षारीय या चूने वाली हो (ज़्यादा pH, मिट्टी में सफेद चूना) या ऊसर हो (नमकीन, सख्त, पानी का निकास खराब)
  • खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहे, जैसे धान में
  • मिट्टी में जैविक पदार्थ कम हो, या मिट्टी रेतीली हो
  • हर साल DAP जैसी फॉस्फेट खाद की भारी मात्रा डाली जाए
  • ज़मीन पर लगातार फसलें ली जाएं, जैसे धान के बाद धान, और जिंक वापस न डाला जाए
  • ज़मीन समतल करते समय ऊपर की मिट्टी हट गई हो
  • रोपाई के बाद ठंडा मौसम जड़ों की बढ़वार धीमी कर दे

यह कब दिखता है

धान में खैरा रोग आमतौर पर रोपाई के 2–4 हफ्ते बाद दिखता है, जब छोटी फसल कल्ले निकाल रही होती है। जिंक की कमी मिट्टी की समस्या है, इसलिए यह उन्हीं खेतों में, हर मौसम में, बार-बार लौटती है, जब तक मिट्टी ठीक न की जाए। किसान अक्सर देखते हैं कि हर साल वही हिस्से पीले पड़ते हैं।

तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सबसे ज़्यादा ध्यान उन खेतों पर दें जहां हर मौसम धान उगता है, नहर से सिंचाई वाले इलाकों में जहां ज़मीन साल के ज़्यादातर समय गीली रहती है, और क्षारीय या नमकीन हिस्सों पर। रबी (यासंगी) धान में, रोपाई के बाद रातें ठंडी हों तो लक्षण ज़्यादा दिख सकते हैं, क्योंकि ठंडी जड़ें कम जिंक लेती हैं। मौसम गर्म होने और जड़ें फैलने पर लक्षण थोड़े कम हो सकते हैं, पर तब तक फसल के कल्ले कम हो चुके होते हैं। इसीलिए बाद में बचाव करने से ज़्यादा ज़रूरी है रोपाई से पहले रोकथाम।

खड़ी फसल में लक्षण दिखें तो क्या करें

  • पहले पक्का करें कि यह कोई कीट या रोग तो नहीं है। कीड़े, फफूंद के धब्बे और पानी की समस्या देखें।
  • पीले हिस्सों की तुलना स्वस्थ हिस्सों से करें। अगर पीले हिस्से कमज़ोर या क्षारीय मिट्टी वाली जगहों पर हैं, तो जिंक की कमी होने की संभावना है।
  • उत्पाद के लेबल के अनुसार, दिन के ठंडे समय में पत्तियों पर जिंक का छिड़काव करें। अगले एक-दो हफ्ते नई पत्तियों को देखते रहें।
  • इन हिस्सों पर निशान लगा लें और अगले मौसम से पहले वहां की मिट्टी की जांच कराएं, ताकि बुवाई या रोपाई के समय उसे ठीक कर सकें।

किन फसलों पर असर होता है

धान: सबसे संवेदनशील फसल। रोपाई के बाद पहले महीने में नुकसान सबसे ज़्यादा होता है, जब यह कल्ले कम कर देती है।

मक्का: बुवाई के बाद पहले कुछ हफ्तों में, पौध की अवस्था में बहुत संवेदनशील।

कपास और मूंगफली: लक्षण बढ़वार की अवस्था में दिखते हैं। उस समय जिंक कम मिले तो बाद में फूल और फली या टिंडे कम लग सकते हैं।

गेहूं, मिर्च, टमाटर और कई सब्ज़ियों में भी ऐसी ही समस्या वाली मिट्टी में जिंक की कमी हो सकती है।

मिट्टी की जांच से पक्का करें

मौसम से पहले मिट्टी का नमूना लें और अपनी नज़दीकी मिट्टी जांच प्रयोगशाला या KVK (कृषि विज्ञान केंद्र) में जांच कराएं। कई राज्य मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) देते हैं, जिसमें दूसरे पोषक तत्वों के साथ जिंक भी बताया जाता है। रिपोर्ट से पता चलता है कि आपके खेत में जिंक की कमी है या नहीं, और कितना डालना है। यह अंदाज़ा लगाने से बेहतर है, क्योंकि ज़्यादा जिंक भी मिट्टी और फसल को नुकसान कर सकता है।

अगर मौसम के बीच लक्षण दिखें, तो लक्षण वाले हिस्से की तुलना स्वस्थ हिस्से से करें। जहां आपकी स्थानीय प्रयोगशाला पत्ती की जांच करती हो, वहां उससे कमी पक्की हो सकती है।

रोकथाम: मिट्टी को मज़बूत बनाएं

  • जैविक पदार्थ: हर मौसम अच्छी सड़ी गोबर की खाद, कम्पोस्ट या हरी खाद डालें। इनसे कुछ जिंक मिलता है, और पौधा मिट्टी में पहले से मौजूद जिंक को ले पाता है।
  • संतुलित खाद: फॉस्फेट मिट्टी जांच के अनुसार ही डालें, उससे ज़्यादा नहीं। ज़्यादा फॉस्फेट जिंक को बांध देता है।
  • पानी: धान में, जहां स्थानीय सलाह थोड़े समय के लिए खेत सुखाने की अनुमति दे, वहां खेत में हर समय गहरा पानी भरा न रखें।
  • किस्में: अपने KVK से पूछें कि क्या आपके इलाके के लिए जिंक को अच्छे से लेने वाली या जिंक से भरपूर किस्में उपलब्ध हैं।

जिंक की कमी का उपचार: मिट्टी में या छिड़काव?

मिट्टी में डालना यानी बुवाई या रोपाई के समय या उससे पहले मिट्टी में जिंक देना। जिंक की कमी वाले खेत को ठीक करने का यह मुख्य तरीका है, और इसका असर छिड़काव से ज़्यादा समय तक रहता है। धान में इसे आमतौर पर रोपाई से पहले मचाए (कीचड़ किए) हुए खेत में बिखेरा जाता है। मिट्टी के लिए सबसे आम स्रोत जिंक सल्फेट है। उतनी ही मात्रा डालें जितनी आपकी मिट्टी जांच रिपोर्ट या कृषि अधिकारी बताए।

पत्तियों पर छिड़काव से थोड़ा जिंक सीधे पत्तियों पर पहुंचता है। यह जल्दी असर करता है और खड़ी फसल में लक्षण दिखने पर काम आता है, पर इससे मिट्टी ठीक नहीं होती। एक से ज़्यादा छिड़काव की ज़रूरत पड़ सकती है।

जिंक सल्फेट को DAP या सिंगल सुपर फॉस्फेट जैसी फॉस्फेट खादों के साथ एक ही बार में मिलाकर न डालें। ये आपस में क्रिया करते हैं और जिंक पौधे को कम मिलता है। इन्हें अलग-अलग डालें।

हमारे स्टोर पर जिंक उत्पाद

हमारे जांचे गए उत्पाद डेटा में केवल नीचे दिए गए उत्पाद में जिंक की कमी के लिए जानकारी है। खुराक ब्रांड के आधिकारिक उत्पाद पेज से ली गई है, जिसमें किसी फसल या फसल की अवस्था का नाम नहीं है।

उत्पादइसमें क्या हैमिट्टी में डालनापत्तियों पर छिड़काव
Aries ProZincजिंक 12%, अमीनो एसिड चिलेट के रूप में (ऐसा रूप जिसे पौधे आसानी से ले लेते हैं)300 g प्रति एकड़लेबल के अनुसार खुराक: 2 g प्रति लीटर पानी

ब्रांड पेज पर प्रति एकड़ घोल की मात्रा या सही फसल अवस्था नहीं दी गई है। यह आपकी फसल और मिट्टी जांच के हिसाब से कैसे ठीक बैठता है, यह अपने कृषि अधिकारी से पूछें।

सुरक्षा

  • ज़्यादा जिंक बेहतर नहीं है। लेबल पर या मिट्टी जांच रिपोर्ट में दी गई खुराक ही डालें।
  • सुबह या शाम के ठंडे समय में छिड़काव करें। तेज़ धूप में गाढ़ा छिड़काव पत्तियों को झुलसा सकता है।
  • खाद के पाउडर और छिड़काव संभालते समय दस्ताने और मास्क पहनें। बाद में हाथ धो लें।
  • खाद को खाने, पशु आहार और बच्चों से दूर रखें।
  • इस्तेमाल से पहले लेबल और पर्चा पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

धान में खैरा रोग किस वजह से होता है?

यह धान में जिंक की कमी है, कोई संक्रमण नहीं। नई पत्तियां आधार पर पीली पड़ती हैं, पुरानी पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे आते हैं, और पौधे छोटे रहते हैं, कल्ले कम निकलते हैं। फफूंदनाशक दवाओं से यह ठीक नहीं होता।

खैरा रोग का कारण किसने खोजा?

पंतनगर के पौध वैज्ञानिक Dr. Y.L. Nene ने 1966 में बताया था कि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में धान का खैरा रोग जिंक की कमी से होता है, और जिंक सल्फेट से यह ठीक हो जाता है।

कैसे पता करें कि मेरे धान में जिंक की कमी है?

रोपाई के 2–4 हफ्ते बाद देखें: नई पत्तियां पीली, पुरानी पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे, और जगह-जगह असमान, बौने पौधे। अगले मौसम से पहले मिट्टी की जांच से पक्का करें।

पौधों में जिंक की कमी के आम लक्षण क्या हैं?

छोटी और पीली नई पत्तियां, गांठों के बीच कम दूरी, और रुकी हुई बढ़वार। मक्का में बीच वाली नस के पास सफेद पट्टियां देखें। कपास और मूंगफली में छोटी पत्तियां देखें जो नसों के बीच पीली हों।

क्या जिंक सल्फेट को DAP के साथ मिला सकते हैं?

नहीं। इन्हें अलग-अलग डालें। मिलाने पर ये आपस में क्रिया करते हैं और फसल को कम जिंक मिलता है।

पत्तियों पर छिड़काव बेहतर है या मिट्टी में डालना?

दोनों अलग काम करते हैं। मिट्टी में डालने से खेत ठीक होता है और असर ज़्यादा समय तक रहता है। पत्तियों पर छिड़काव खड़ी फसल में जल्दी राहत देता है। कई किसान आधार के रूप में मिट्टी में जिंक डालते हैं, और फिर भी लक्षण दिखें तो छिड़काव करते हैं।

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स्रोत

फसल के अनुसार इसे नियंत्रित करने वाले उत्पाद

सभी कृषि फसलें

एक ही उत्पाद बार-बार न छिड़कें। अलग क्रिया-विधि (लेबल पर ग्रुप नंबर) वाले उत्पाद से बदलें, ताकि कीट या रोग में प्रतिरोध न बने।

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