गेहूँ में करनाल बंट: लक्षण, पहचान और रोकथाम
· लेखक: AgriVruddhi

ऊपर की फ़ोटो: फफूंद का एक सुप्त बीजाणु, असली आकार से लगभग 2,000 गुना बड़ा। ऐसे लाखों बीजाणु मिलकर संक्रमित दाने के अंदर का काला पाउडर बनाते हैं, फ़ोटो: Jim Plaskowitz, USDA Agricultural Research Service, Public domain
छोटा जवाब
करनाल बंट गेहूँ का एक फफूंद रोग है, जो Tilletia indica से होता है। यह बीज और मिट्टी से फैलता है और कुछ दानों के एक हिस्से को काले पाउडर में बदल देता है, जिससे सड़ी मछली जैसी बदबू आती है। पैदावार का नुकसान आमतौर पर कम होता है, पर दाने की गुणवत्ता और व्यापार को नुकसान होता है। साफ बीज, फसल चक्र, अच्छी जल निकासी और अपने KVK की समय पर सलाह से इसे रोकें।
गेहूँ में करनाल बंट की पहचान कैसे करें
इस रोग को आंशिक बंट भी कहते हैं। हिंदी में इसे करनाल बंट और तेलुगु में కర్నాల్ బంట్ कहते हैं। इसका नाम हरियाणा के करनाल शहर पर पड़ा, जहाँ यह पहली बार 1931 में दर्ज हुआ था।
खड़ी फसल में इसे देखना मुश्किल है। तनों के एक झुंड में कुछ ही बालियाँ संक्रमित होती हैं, और एक बाली में कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं। बाहर से बालियाँ लगभग सामान्य दिखती हैं। इसे पहचानने का सबसे आसान समय मड़ाई के बाद है, जब आप दाने को खुद देखते हैं।
- दाना आधा काला: दाने के भ्रूण वाले सिरे (जिस सिरे से बीज अंकुरित होता है) से काला, पाउडर जैसा पदार्थ शुरू होता है। ज़्यादा प्रकोप में यह दाने के पेट की नाली के साथ-साथ फैल जाता है। दाने का बाकी हिस्सा सामान्य रहता है। इसीलिए इसे "आंशिक" बंट कहते हैं।
- छिपा हुआ नुकसान: दाने का बाहरी छिलका अक्सर साबुत रहता है, और काला हिस्सा नाली की तरफ हो सकता है। शक वाले दाने को तोड़कर अंदर का पाउडर देखें।
- गंभीर हालत में खोखला दाना: अंदर का हिस्सा खा लिया जाता है और सिर्फ़ खोल बचता है, जैसे छोटी नाव। वैज्ञानिक इसे "कैनो" लक्षण कहते हैं।
- मछली जैसी बदबू: कुचले हुए संक्रमित दाने से सड़ी मछली जैसी गंध आती है। यह गंध फफूंद के बनाए रसायन ट्राइमेथिलामीन (trimethylamine) से आती है। जिस ढेर में संक्रमित दाने ज़्यादा हों, उसमें बिना कुचले भी गंध आती है।
- खेत में: ज़्यादा संक्रमित स्पाइकलेट (बाली की छोटी इकाई) में भूसी (ग्लूम) थोड़ी फैल जाती है और कुछ बंट वाले दाने ज़मीन पर गिर सकते हैं।
मिलते-जुलते रोग और उनमें फ़र्क कैसे करें
- खुला कंडुआ (लूज़ स्मट): बाली निकलते समय बीच के डंठल को छोड़कर पूरी बाली काले पाउडर में बदल जाती है। हवा पाउडर उड़ा ले जाती है और सिर्फ़ नंगा डंठल बचता है। यह खेत में आसानी से दिखता है। आंशिक बंट में बाली सामान्य दिखती है और कुछ ही दाने आधे काले होते हैं।
- पहाड़ी बंट (कॉमन बंट या दुर्गंध कंडुआ): यह दूसरी Tilletia फफूंदों से होता है। पूरा दाना गहरे बीजाणुओं की गेंद बन जाता है, और इसमें भी मछली जैसी बदबू आती है। यह ठंडे पहाड़ी इलाकों का रोग है। आंशिक बंट में ज़्यादातर संक्रमित दाने सिर्फ़ आधे काले होते हैं।
- ब्लैक पॉइंट (दाने का काला सिरा): दाने के भ्रूण वाले सिरे पर गहरा भूरा या काला दाग। दाने को तोड़ें: अंदर से ठोस और सफेद होता है, काला पाउडर नहीं होता।

जीवन चक्र और यह कब हमला करता है
फफूंद मज़बूत, मोटी दीवार वाले सुप्त बीजाणुओं के रूप में ज़िंदा रहती है। हर बीजाणु इतना छोटा होता है कि आँख से नहीं दिखता। बंट वाले दाने का काला पाउडर ऐसे ही लाखों बीजाणुओं से बना होता है।
- मिट्टी में पहुँचना: कटाई, मड़ाई और ओसाई के समय बंट वाले दानों के बीजाणु मिट्टी पर गिर जाते हैं। संक्रमित बीज भी बीजाणुओं को नए खेतों तक ले जाता है।
- लंबी उम्र: बीजाणु मिट्टी में कई साल तक ज़िंदा रह सकते हैं। बहुत गहरे दबे बीजाणु धीरे-धीरे अपनी जान खो देते हैं।
- जाग उठना: उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग मध्य फरवरी से मध्य मार्च तक, जब बारिश या सिंचाई से मिट्टी नम होती है, तो सतह के पास के बीजाणु जाग जाते हैं। वे बहुत छोटे द्वितीयक बीजाणु (स्पोरिडिया) बनाते हैं।
- बाली तक पहुँचना: हवा और बारिश की छींटें इन द्वितीयक बीजाणुओं को गेहूँ की बालियों तक ले जाती हैं।
- संक्रमण: फसल में संक्रमण सिर्फ़ लगभग 2 से 3 सप्ताह तक हो सकता है, यानी बाली पर दाढ़ी (बारीक रेशे) निकलने से फूल आने के अंत तक। फफूंद फूलों में घुसती है और कच्चे दाने के अंदर बढ़ती है।
- वापस मिट्टी में: दाने के अंदर नए काले बीजाणु बनते हैं। कटाई पर वे वापस मिट्टी में गिर जाते हैं, इसलिए हर संक्रमित फसल अगली गेहूँ की फसल के लिए और बीजाणु छोड़ जाती है।
कौन सा मौसम इसे बढ़ाता है: ठंडा, बादल वाला और नमी भरा मौसम, जिसमें बाली निकलने के समय रुक-रुक कर बारिश हो। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों की एक समीक्षा में अधिकतम तापमान लगभग 19 से 23 °C और न्यूनतम 8 से 10 °C बताया गया है, उसके बाद बारिश से ज़्यादा नमी। गेहूँ के राष्ट्रीय IPM पैकेज में 18 से 20 °C और मिट्टी में ज़्यादा नमी बताई गई है। सिंचित खेतों में बीजाणु ज़्यादा अंकुरित होते हैं, और धान-गेहूँ प्रणाली में मक्का-गेहूँ से ज़्यादा जोखिम रहता है।
भारत में यह कहाँ होता है: इसी IARI समीक्षा के अनुसार यह रोग पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के कुछ हिस्सों, मध्य प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश की निचली पहाड़ियों और जम्मू क्षेत्र में मिला है। पुराने सर्वेक्षणों में यह अविभाजित आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र या तमिलनाडु में नहीं मिला। बाली निकलने के समय जो मौसम इसे चाहिए, वह मध्य और दक्षिण भारत में आमतौर पर नहीं होता। तेलंगाना के गेहूँ किसानों के लिए मुख्य सावधानी यही है कि साफ, प्रमाणित बीज बोएँ, क्योंकि यह रोग बीज के साथ फैल सकता है।
यह किन फसलों पर लगता है
गेहूँ: ब्रेड गेहूँ इसका मुख्य मेज़बान है। ड्यूरम गेहूँ और ट्रिटिकेल को भी यह हो सकता है। संक्रमण बाली पर दाढ़ी निकलने से फूल आने के अंत तक होता है। नुकसान तभी दिखता है जब दाना भरता है, और इसे मड़ाई के बाद ढूँढना सबसे आसान है।
पैदावार का नुकसान आमतौर पर कम होता है। IARI की समीक्षा में लिखा है कि भारत में सबसे खराब सालों में भी गेहूँ के कुल उत्पादन का सिर्फ़ लगभग 0.2 से 0.5% नुकसान हुआ। इसकी बड़ी चोट गुणवत्ता और व्यापार पर पड़ती है:
- गंध और स्वाद: समीक्षा में बताए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 3% बंट वाले दानों वाले गेहूँ से बनी चपातियों में मछली जैसी गंध आती थी और वे खाने में बुरी लगती थीं।
- बीज: बीज का ढेर तभी प्रमाणित होता है जब बंट वाले दाने एक सख़्त सीमा से कम हों, इसलिए संक्रमित बीज वाली फसल रद्द हो सकती है।
- व्यापार: कई देश इस रोग वाले इलाकों के गेहूँ पर क्वारंटीन नियम (रोग को देश में आने से रोकने वाले नियम) लगाते हैं।
कब कदम उठाएँ
हमें इस रोग के लिए किसी मान्य सार्वजनिक स्रोत से आर्थिक सीमा (रोग का वह स्तर जिससे आगे नियंत्रण पर खर्च फ़ायदेमंद हो) नहीं मिली, इसलिए हम कोई सीमा नहीं बताते। गेहूँ का राष्ट्रीय IPM पैकेज भी कोई सीमा नहीं देता। दो बातें इस रोग को अलग बनाती हैं:
- दाना बनने तक खेत में यह रोग दिखता नहीं। तब तक फूल आने के समय संक्रमण हो चुका होता है। नियंत्रण की योजना बालियाँ निकलने से पहले बनानी होती है।
- जोखिम आपके बीज, खेत के इतिहास और मौसम पर निर्भर है। ज़्यादा जोखिम का मतलब है अनजान स्रोत का बीज, ऐसा खेत जिसमें पहले बंट वाला दाना निकला हो, और बाली पर दाढ़ी निकलने के आसपास बादल और बारिश वाले दिन। नीची जगहें जहाँ पानी रुकता है, और गिरी हुई फसल में भी रोग ज़्यादा दिखता है।
मड़ाई के बाद एक मुट्ठी दाने सफेद कागज़ पर फैलाएँ और ऐसे दाने ढूँढें जो भ्रूण वाले सिरे पर काले हों। शक वाले दानों को तोड़ें। दानों को सूँघें। जो मिले उसे लिख लें, ताकि अगले मौसम के लिए बीज और फसल की योजना बना सकें।
बिना रसायन के करनाल बंट की रोकथाम
ये कदम गेहूँ के राष्ट्रीय IPM पैकेज, IARI की समीक्षा और विश्वविद्यालयों की विस्तार सलाह से लिए गए हैं। हर कदम जोखिम घटाता है। कोई एक कदम अकेले रोग को नहीं रोकता।
- साफ बीज: प्रमाणित बीज या स्वस्थ फसल का बीज बोएँ। जिस ढेर में बंट वाले दाने हों या मछली जैसी गंध हो, उसका बीज कभी न बोएँ।
- सहनशील किस्में: ब्रेड गेहूँ की कोई किस्म पूरी तरह रोग-रोधी नहीं है, पर कुछ में रोग बहुत कम लगता है। अपने KVK (कृषि विज्ञान केंद्र) या राज्य कृषि विश्वविद्यालय से पूछें कि आपके इलाके में कौन सी किस्में ठीक रहेंगी।
- फसल चक्र: गेहूँ की जगह ऐसी फसल उगाएँ जो इसकी मेज़बान नहीं है, जैसे दलहन या तिलहन। IARI की समीक्षा में मिट्टी के बीजाणु घटाने के लिए दो साल तक गेहूँ न बोने का सुझाव दिया गया है।
- ज़मीन समतल करें और पानी निकालें: खेत के नीचे वाले हिस्सों में पानी जमा होता है और रोग ज़्यादा लगता है। अच्छा समतलीकरण और जल निकासी मदद करती है।
- बीज दर और दूरी: कम बीज दर और चौड़ी कतारें फसल को खुला रखती हैं, जो जल्दी सूखती है। अपने KVK की बताई सीमा के अंदर रहें।
- संतुलित खाद: नाइट्रोजन और पोटाश संतुलित डालें ताकि फसल गिरे नहीं। ज़्यादा यूरिया फसल को नरम और भारी बना देता है।
- सिंचाई का समय: IPM पैकेज के अनुसार बाली पर दाढ़ी निकलने से फूल आने के अंत तक सिंचाई से बचने पर रोग धीमा हो सकता है। इस अवस्था में फसल को पानी की कमी से कष्ट न होने दें। अपनी मिट्टी में सिंचाई का समय कैसे रखें, यह अपने KVK से पूछें।
- बुवाई की तारीख: लक्ष्य यह है कि बालियाँ निकलने का समय ठंडे, बारिश वाले दौर में न पड़े। बुवाई की तारीख बदलने से मदद मिल सकती है, पर देर से बुवाई पैदावार भी घटा सकती है। अपने KVK की बताई बुवाई की अवधि मानें।
- गर्मी में मिट्टी तपाना (सोलराइज़ेशन): IARI की समीक्षा में गर्मी के मौसम में नम मिट्टी को 21 से 28 दिन तक पारदर्शी प्लास्टिक की चादर से ढकने की बात लिखी है। गर्मी सतह के पास के कई बीजाणुओं को मार देती है। यह छोटे प्लॉट और बीज वाले प्लॉट के लिए ठीक है।
- अंतर-फसल: IARI की समीक्षा में लिखा है कि गेहूँ की कतारों के बीच चना उगाने से मिट्टी से आने वाले बीजाणु घटे।
- साफ मशीनें और बोरे: कंबाइन, थ्रेशर, ट्रॉली और बोरे जो संक्रमित खेत में काम आए हों, बीजाणु ढोते हैं। इन्हें अपने खेत में लाने से पहले साफ करें। संक्रमित खेत का भूसा या मड़ाई की धूल न फैलाएँ।
रासायनिक नियंत्रण: बालियाँ निकलने से पहले योजना बनाएँ
हमारे स्टोर के किसी भी उत्पाद के लेबल रिकॉर्ड में गेहूँ पर करनाल बंट नहीं लिखा है, इसलिए हम यहाँ कोई उत्पाद नहीं बताते। इन बातों का ध्यान रखें:
- बीज उपचार से फूल आने के समय फसल सुरक्षित नहीं होती। संक्रमण बाली निकलने के समय हवा में मौजूद बीजाणुओं से आता है, आपके बोए बीज से नहीं। यह भी साबित नहीं हुआ है कि बीज उपचार बीज पर लगे सभी बीजाणुओं को मार देता है।
- काले दाने दिखने के बाद छिड़काव करना बहुत देर है। दाने फूल आने के समय ही संक्रमित हो चुके थे।
- सही समय सबसे ज़रूरी है। भारत में हुए शोध में ज़्यादा जोखिम वाले खेतों में बाली निकलने के समय फफूंदनाशक छिड़काव आज़माए गए हैं।
अपने स्थानीय कृषि अधिकारी या KVK से ऐसा उत्पाद पूछें जिसके लेबल पर गेहूँ में करनाल बंट लिखा हो। उत्पाद और मात्रा वही लें जो उसके लेबल पर छपी है। आप हमारे फफूंदनाशक देख सकते हैं, पर सिर्फ़ वही उत्पाद लें जिसके लेबल पर गेहूँ में यह रोग लिखा हो।
अगर आप छिड़काव करें:
- एक बार में एक ही उत्पाद इस्तेमाल करें। एक टंकी में उत्पाद न मिलाएँ।
- बालियों को अच्छी तरह भिगोएँ, जैसा लेबल कहता है।
- अगर एक मौसम में एक से ज़्यादा बार छिड़काव करें, तो अगले छिड़काव के लिए अपने KVK से दूसरे समूह का फफूंदनाशक पूछें। इससे प्रतिरोध (जब फफूंद पर दवा असर करना बंद कर दे) धीमा पड़ता है।
सुरक्षा
- घोल बनाते और छिड़कते समय दस्ताने, मास्क, पूरी बाँह के कपड़े और जूते पहनें। काम के दौरान कुछ न खाएँ, न पिएँ और न धूम्रपान करें। बाद में अच्छी तरह नहाएँ-धोएँ।
- काले पाउडर वाले दानों की सफ़ाई या मड़ाई करते समय मास्क पहनें। बीजाणु धूल बनकर हवा में उठते हैं।
- सुबह या शाम को छिड़कें, तेज़ हवा में या दोपहर की तेज़ धूप में नहीं।
- जो उत्पाद आप इस्तेमाल करें, उसके लेबल पर छपी कटाई से पहले की इंतज़ार की अवधि मानें।
- छिड़काव का घोल और धोया हुआ पानी तालाबों, नहरों और कुओं से दूर रखें।
- इस्तेमाल से पहले लेबल और पर्चा पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गेहूँ में करनाल बंट के लक्षण क्या हैं?
कुछ दाने भ्रूण वाले सिरे पर और नाली के साथ काले और पाउडर जैसे हो जाते हैं, जबकि दाने का बाकी हिस्सा सामान्य दिखता है। कुचले दानों से सड़ी मछली जैसी गंध आती है। सिर्फ़ कुछ बालियाँ और हर बाली के कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं, इसलिए इसे मड़ाई के बाद ढूँढना सबसे आसान है।
मेरे गेहूँ के दाने से सड़ी मछली जैसी गंध क्यों आती है?
गेहूँ के दाने से मछली जैसी गंध आना बंट रोग की आम निशानी है। फफूंद ट्राइमेथिलामीन नाम का रसायन बनाती है। कुछ दाने तोड़कर अंदर काला पाउडर देखें। उस ढेर को बीज के लिए न रखें।
क्या इस रोग वाले खेत का बीज रख सकते हैं?
नहीं। यह रोग बीज के साथ फैलता है, और बीज का ढेर प्रमाणित होने के लिए एक सख़्त सीमा से कम रहना चाहिए। प्रमाणित बीज खरीदें या स्वस्थ फसल का बीज लें।
क्या बीज उपचार से यह रोग रुक जाएगा?
अकेले नहीं। फसल में संक्रमण बाली निकलते समय मिट्टी के बीजाणुओं से होता है, जिन्हें हवा और बारिश ऊपर पहुँचाती है। साफ बीज से आप खेत में नए बीजाणु लाने से बचते हैं, और ऊपर बताए खेत के कदम बाली निकलते समय जोखिम घटाते हैं।
क्या यह रोग तेलंगाना में होता है?
यह मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम भारत का रोग है। पुराने सर्वेक्षणों में यह अविभाजित आंध्र प्रदेश में दर्ज नहीं हुआ, और बाली निकलते समय जिस ठंडे, बारिश वाले मौसम की इसे ज़रूरत है, वह दक्षिण में आमतौर पर नहीं होता। मुख्य जोखिम संक्रमित बीज है, इसलिए भरोसेमंद जगह से प्रमाणित बीज खरीदें।
क्या यह खुले कंडुआ जैसा ही है?
नहीं। खुला कंडुआ बाली निकलते समय पूरी बाली को काले पाउडर में बदल देता है, और यह खेत में दिखता है। आंशिक बंट में बाली सामान्य दिखती है और कुछ ही दानों का एक हिस्सा काला होता है।
और पढ़ें
- गेहूँ का पीला रतुआ और दूसरे रतुआ रोग: लक्षण और रोकथाम
- मिर्च, अंगूर, आम और गेहूँ के लिए चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) फफूंदनाशक गाइड
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- सभी फफूंदनाशक
स्रोत
- D V Singh और Robin Gogoi, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, Indian Journal of Agricultural Sciences 81(1), 2011 (ICAR): गेहूँ (Triticum spp) का करनाल बंट: वैश्विक स्थिति
- पौध संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय और राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य प्रबंधन संस्थान (NIPHM): गेहूँ के लिए AESA आधारित IPM पैकेज
- University of Arizona Cooperative Extension, M J Ottman: करनाल बंट नियंत्रण के लिए खेती के तरीके (az1287)
- तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, TNAU Agritech Portal: गेहूँ के रोग (खुला कंडुआ)
- तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, TNAU Agritech Portal: गेहूँ के रोग (खुला कंडुआ)
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